" गौ रक्षा करो !! गौ हत्या बंद करो !! " और दूसरे प्राणीओं का क्या ??!!
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एक बात मुझे समझ नहीं आ रही की , हमारे 'सो कोल्ड' हिन्दू सनातन धर्म के पौराणिक ग्रन्थों मे सिर्फ गाय को ही माता का पवित्र दर्ज़ा क्यूँ दिया गया हैं ??!! जब की भैंस तो उस से भी ज्यादा इन्सानों के काम मे आती रही हैं !!! क्या काला रंग होने से ये 'रंग भेद' हमारे धर्म ग्रन्थों के रचयिताओं ने तो हम पर नहीं थोपा ना ??!! भैंस के साथ साथ भैंसा,सांढ, बैल,बकरी, भेड, ऊंट,याक आदि प्राणीओं के दूध और चमड़े को भी हम इंसान अपनी जरूरत के मुताबिक उपयोग मे लेते आए हैं ! मेरी नज़र मे ये सभी उपयोगी प्राणी गाय जीतने ही बड़े एहसान, इन्सानों पर अलग अलग स्थानों पर कर रहे हैं !! लाखों सालों के बिकास क्रम मे इस धरती पर सब से बुद्धिमान प्राणी 'इंसान' ने वक़्त के साथ साथ इतनी जोरदार तरक्की की हैं , के बाकी के सारे प्राणीओं को बस इंसानों की सहूलियत के हिसाब से ही जीना और मरना पड रहा हैं !!! (यहाँ मैंने हाथ पैर मुह वाले गरम या ठंडे खून वाले और चलते फिरते प्राणी की बात की हैं , पेड़ पौधे और गाजर-मुली पर मेरा मंथन चालू हैं ! )grin emoticon tongue emoticon
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दरिया मे हर बड़ा जीव अपने से छोटे जीव को खा कर ही खुद को ज़िंदा रख पाता हैं , वैसे ही जंगल या कई इलाकों मे हर बड़ा प्राणी (घाँस खानेवाले प्राणीओं को छोड़कर) अपने से छोटे प्राणी का शिकार कर के उनको खाता हैं !! अपना जीवन बचाए रखने के लिए इन मांसाहारी प्राणीओं के पास और कोई विकल्प उपलब्ध नहीं - इसलिए उन सब के लिए ये एक कुदरती प्रक्रिया और क्षमा योग्य कृत्य हैं !! ये संशोधात्मक-तार्किक सत्य हैं की , इंसानों की आहार श्रंखला मे अगर पशु-पक्षी और पानी मे रहते जीवों को शामिल ना किया जाये तो , शायद दुनिया के शुदूर इलाकों मे बसे हुए लोग ठीक से 'सर्वाइव' नहीं कर पाएंगे ! ऊपर से उतनी ज्यादा तदात मे सब्ज़ी-फलों की आपूर्ति भी इस धरती पर सभी इन्सानों के लिए ठीक से करना बड़ा कठिन होगा ! पर जहां शक्य हों , जहां बेहत्तर विकल्प हों - वहाँ इंसानों को सिर्फ अपने स्वाद के लिए किसी दूसरे प्राणीओं को लगातार मार कर खाते रेहना , कम से कम मुझे तो ठीक नहीं लगता !!
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आज अगर भारत की बात की जाये तो , हम सब भारतीय इतने स्वार्थी हो गए हैं की - जो जो गाय को पालता हैं वो जब तक गाय दूध देती हैं तब तक ही उसको 'माता' बनाकर घर मे रखतें हैं !! जैसे ही बेचारी ने दूध देना बंद किया की , उसको बाहर रास्ते पर छोड़ दिया जाता हैं !! क्यूंकी उसको पता हैं की , इस देश मे गाय के नाम पर चारा देने वाले , और गाय के नाम पर दान देने वाले बहुत मिल जाएंगे !! भले ही फिर उसकी छोडी हुई गाय सड़कें जाम कर दें - राहदारीओं को शिंगों से उड़ाएँ - दुनियाभर का मल-मूत्र सरेआम त्यागें और गंदगी फैलाएँ !! अगर सही मे गाय या इन्सानों के काम मे आते प्राणीओं को आदर देना हों तो , सिर्फ उन्ही लोगों को इनको पालने का परमिट देना चाहिएँ जो सही मायनों मे ज़िम्मेवार पशुपालक हों !
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इंसानों की फेंकी हुई प्लास्टिक बेग्स ये गायें ये सांढ खाते हैं , और बड़ी बेदर्दी से सड़कों पर दम तोड़ देते हैं !! खुदगर्ज़ इंसान अपनी सहूलियत और जरूरत खत्म होने के बाद अपने पाले हुए प्राणी से इस कदर मुह मोड देता हैं की जैसे कभी उस प्राणी को जानता ही नहीं था !!! इन्सानों के लिए उपयोगी प्राणीओं को लेकर अब कडक कानून और निश्चित व्यवस्था की जरूरत हैं !! कसाइयों पर पाबन्दीओं से पेहले हम सब को अपने अपने फर्ज़ को ध्यान मे रखना चाहिएँ !! रास्ते पर घूमने वाले तमाम प्राणीओं की नसबंदी करवा कर , सरकारी पशु संरक्षण बाड़ों मे डालना चाहिएँ , और वहाँ भी ये सब प्राणी ठीक से अपनी बची खुची ज़िंदगी ठीक से बिताएँ - ये सुनिश्चित करना चाहिएँ ! साथ मे जिन जिन पशु पालकों ने अपने प्राणीओं के प्रति अपना फर्ज़ ठीक से ना निभाया हों - उनको भी सज़ा मिलनी चाहिएँ!
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- आनंद माड़म . 7.00pm . 4.6.2015
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एक बात मुझे समझ नहीं आ रही की , हमारे 'सो कोल्ड' हिन्दू सनातन धर्म के पौराणिक ग्रन्थों मे सिर्फ गाय को ही माता का पवित्र दर्ज़ा क्यूँ दिया गया हैं ??!! जब की भैंस तो उस से भी ज्यादा इन्सानों के काम मे आती रही हैं !!! क्या काला रंग होने से ये 'रंग भेद' हमारे धर्म ग्रन्थों के रचयिताओं ने तो हम पर नहीं थोपा ना ??!! भैंस के साथ साथ भैंसा,सांढ, बैल,बकरी, भेड, ऊंट,याक आदि प्राणीओं के दूध और चमड़े को भी हम इंसान अपनी जरूरत के मुताबिक उपयोग मे लेते आए हैं ! मेरी नज़र मे ये सभी उपयोगी प्राणी गाय जीतने ही बड़े एहसान, इन्सानों पर अलग अलग स्थानों पर कर रहे हैं !! लाखों सालों के बिकास क्रम मे इस धरती पर सब से बुद्धिमान प्राणी 'इंसान' ने वक़्त के साथ साथ इतनी जोरदार तरक्की की हैं , के बाकी के सारे प्राणीओं को बस इंसानों की सहूलियत के हिसाब से ही जीना और मरना पड रहा हैं !!! (यहाँ मैंने हाथ पैर मुह वाले गरम या ठंडे खून वाले और चलते फिरते प्राणी की बात की हैं , पेड़ पौधे और गाजर-मुली पर मेरा मंथन चालू हैं ! )grin emoticon tongue emoticon
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दरिया मे हर बड़ा जीव अपने से छोटे जीव को खा कर ही खुद को ज़िंदा रख पाता हैं , वैसे ही जंगल या कई इलाकों मे हर बड़ा प्राणी (घाँस खानेवाले प्राणीओं को छोड़कर) अपने से छोटे प्राणी का शिकार कर के उनको खाता हैं !! अपना जीवन बचाए रखने के लिए इन मांसाहारी प्राणीओं के पास और कोई विकल्प उपलब्ध नहीं - इसलिए उन सब के लिए ये एक कुदरती प्रक्रिया और क्षमा योग्य कृत्य हैं !! ये संशोधात्मक-तार्किक सत्य हैं की , इंसानों की आहार श्रंखला मे अगर पशु-पक्षी और पानी मे रहते जीवों को शामिल ना किया जाये तो , शायद दुनिया के शुदूर इलाकों मे बसे हुए लोग ठीक से 'सर्वाइव' नहीं कर पाएंगे ! ऊपर से उतनी ज्यादा तदात मे सब्ज़ी-फलों की आपूर्ति भी इस धरती पर सभी इन्सानों के लिए ठीक से करना बड़ा कठिन होगा ! पर जहां शक्य हों , जहां बेहत्तर विकल्प हों - वहाँ इंसानों को सिर्फ अपने स्वाद के लिए किसी दूसरे प्राणीओं को लगातार मार कर खाते रेहना , कम से कम मुझे तो ठीक नहीं लगता !!
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आज अगर भारत की बात की जाये तो , हम सब भारतीय इतने स्वार्थी हो गए हैं की - जो जो गाय को पालता हैं वो जब तक गाय दूध देती हैं तब तक ही उसको 'माता' बनाकर घर मे रखतें हैं !! जैसे ही बेचारी ने दूध देना बंद किया की , उसको बाहर रास्ते पर छोड़ दिया जाता हैं !! क्यूंकी उसको पता हैं की , इस देश मे गाय के नाम पर चारा देने वाले , और गाय के नाम पर दान देने वाले बहुत मिल जाएंगे !! भले ही फिर उसकी छोडी हुई गाय सड़कें जाम कर दें - राहदारीओं को शिंगों से उड़ाएँ - दुनियाभर का मल-मूत्र सरेआम त्यागें और गंदगी फैलाएँ !! अगर सही मे गाय या इन्सानों के काम मे आते प्राणीओं को आदर देना हों तो , सिर्फ उन्ही लोगों को इनको पालने का परमिट देना चाहिएँ जो सही मायनों मे ज़िम्मेवार पशुपालक हों !
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इंसानों की फेंकी हुई प्लास्टिक बेग्स ये गायें ये सांढ खाते हैं , और बड़ी बेदर्दी से सड़कों पर दम तोड़ देते हैं !! खुदगर्ज़ इंसान अपनी सहूलियत और जरूरत खत्म होने के बाद अपने पाले हुए प्राणी से इस कदर मुह मोड देता हैं की जैसे कभी उस प्राणी को जानता ही नहीं था !!! इन्सानों के लिए उपयोगी प्राणीओं को लेकर अब कडक कानून और निश्चित व्यवस्था की जरूरत हैं !! कसाइयों पर पाबन्दीओं से पेहले हम सब को अपने अपने फर्ज़ को ध्यान मे रखना चाहिएँ !! रास्ते पर घूमने वाले तमाम प्राणीओं की नसबंदी करवा कर , सरकारी पशु संरक्षण बाड़ों मे डालना चाहिएँ , और वहाँ भी ये सब प्राणी ठीक से अपनी बची खुची ज़िंदगी ठीक से बिताएँ - ये सुनिश्चित करना चाहिएँ ! साथ मे जिन जिन पशु पालकों ने अपने प्राणीओं के प्रति अपना फर्ज़ ठीक से ना निभाया हों - उनको भी सज़ा मिलनी चाहिएँ!
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- आनंद माड़म . 7.00pm . 4.6.2015