'गुजरात मे पाटीदार और उनके साथ साथ दूसरे सवर्णों की आरक्षण की माँग - कितनी सही ?!'
.
देश की कुल आबादी के 54% 'ओबीसी' के तहेत आती ज्ञाति-जातीयों को जो 27% आरक्षण मिल रहा हैं , ये उनका संवैधानिक अधिकार हैं ! आरक्षण मे 'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' ज्ञाति-जातीयों को बराबर का सामाजिक न्याय मिले , उसी भावना से कुल 49% का आरक्षण मिल रहा हैं - जब की तामिलनाडु मे तो उससे भी ज्यादा आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था अमल मे हैं ...!
.
'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' आरक्षण तब तक ज़ारी रहेगा , जब तक पिछडा समाज अगड़े समाज जितना, मुख्य धारा मे नहीं आता । कुल 22 छोटे से छोटे पॉइंट्स को देख कर आरक्षण की केटेगरी तय की जाती हैं । गुजरात का पाटीदार समाज , आरक्षण के संवैधानिक मापदंडो पर किसी भी तरह खरा नहीं उतरता ... ! और संविधान मे तो कहीं भी आर्थिक मापदंड का प्राविधान ही नहीं हैं ...!
.
130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के किसी राज्य मे कुछेक ज्ञाति-जाती अगर हजारों - लाखों की संख्या मे सड़क पर आ जाएगी तो, उससे आरक्षण नहीं मिल जाएगा ! ना सर्वोच्च अदालत , ना कोई भी सरकार और ना कोई भी राष्ट्रीय राजनैतिक दल ऐसे आरक्षण का समर्थन करेंगे ॥ जहां बरसों से जाती आधारित जनगणना के सही सही आंकड़े सभी सरकारें ज़ाहिर करने से बच रही हैं , वहाँ अगड़ों को आरक्षण वें किस तरह से दे पाएगी ?!
.
ये 'पिछड़ों' के संवैधानिक आरक्षण का विरोध ज़्यादातर वें लोग ही कर रहे हैं जो जन्मगत 'अगड़े' हैं, और आर्थिक रूप से सक्षम हैं ! उन्होने 'जन्मगत अगड़े पर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों' को आगे कर के अपने सत्ता मे टूट रहे एकाधिकार को टीकाये रखने के लिए ये आंदोलन चलवाया हैं !! उनका आक्रोश ये हैं की , " 'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' के कुछेक लोग आर्थिक पैमानों पर आगे निकल चुकने के बावजूद भी आरक्षण का लाभ क्यूँ ले रहे हैं !!" तो जवाब ये हैं की, पिछड़ेवर्गों को आरक्षण 'गरीब होने पर' नहीं लेकिन, प्रशासन में उन के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए दिया गया है । कुछेक लोग आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भी, आज तक केन्द्रीय प्रशासन में प्रथम वर्ग की नौकरियो में 2011-12 में सिर्फ 6.9% ही है और 27% क्वोटा आजतक भरा गया नहीं है !! सामाजिक रूप से आज भी उन ज्ञाति-जातीयों की हालत पिछड़ी हुई हैं - आज भी उनका प्रतिनिधित्व ना तो सरकार मे ज्यादा हैं - ना ही सरकारी या निजी क्षेत्र की नौकरियों मे ठीक से हैं !!
.
पाटीदार के साथ साथ अब तो क्षत्रिय राजपूत , ब्राह्मण और वैश्य समाज भी मैदान मे उतर आए हैं !! मतलब की ये सब 'अगड़े - सवर्ण' लोग अब साथ मिलकर 'आरक्षण' को ही समाप्त करने की साज़िश रच रहे हैं - और देश के संविधान की मूलतः भावना को ही ठेस पोहंचना चाहते हैं !! शुक्र हैं , की इनके साथ ना कोई राजकीय दल हैं , और ना ही भारत के संविधान की रक्षा करने वाली सर्वोच्च अदालत हैं !!
.
जिनको भी आरक्षण चाहिए , वे पेहले आरक्षण को ठीक से समझे , सारी सही संवैधानिक प्रक्रियाओं को ठीक से अनुसरे - फिर नए सर्वे होने दे - फिर अगर मापदंडो पर खरे उतरे तब जाकर कुछ हो सकता हैं - हजारों की भीड़ से सड़क पर रैलीयों से अराजकता फैलाकर ना तो आरक्षण मिल सकता हैं , ना ही उसके एक भी मापदंड को बदला जा सकता हैं ! संविधान मे एक और बदलाव कर के 'आर्थिक मापदंड' पर भी थोड़ा आरक्षण मिले, उसके लिए किसी एक बड़े राजनैतिक दल को तो अपने साथ लाकर दिखाओ ! फिर शायद भविष्य मे कुछ हों ... !! वैसे कोई सरकार या सर्वोच्च अदालत 49% से ऊपर जाकर जो सवर्ण आर्थिक रूप से कमजोर हों - उनको 11% का और नया आरक्षण दे दें तो किसी को शायद शिकायत ना होगी ! जय हो !
.
- आनंद माड़म 6.45am . 18.08.2015
.
देश की कुल आबादी के 54% 'ओबीसी' के तहेत आती ज्ञाति-जातीयों को जो 27% आरक्षण मिल रहा हैं , ये उनका संवैधानिक अधिकार हैं ! आरक्षण मे 'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' ज्ञाति-जातीयों को बराबर का सामाजिक न्याय मिले , उसी भावना से कुल 49% का आरक्षण मिल रहा हैं - जब की तामिलनाडु मे तो उससे भी ज्यादा आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था अमल मे हैं ...!
.
'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' आरक्षण तब तक ज़ारी रहेगा , जब तक पिछडा समाज अगड़े समाज जितना, मुख्य धारा मे नहीं आता । कुल 22 छोटे से छोटे पॉइंट्स को देख कर आरक्षण की केटेगरी तय की जाती हैं । गुजरात का पाटीदार समाज , आरक्षण के संवैधानिक मापदंडो पर किसी भी तरह खरा नहीं उतरता ... ! और संविधान मे तो कहीं भी आर्थिक मापदंड का प्राविधान ही नहीं हैं ...!
.
130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के किसी राज्य मे कुछेक ज्ञाति-जाती अगर हजारों - लाखों की संख्या मे सड़क पर आ जाएगी तो, उससे आरक्षण नहीं मिल जाएगा ! ना सर्वोच्च अदालत , ना कोई भी सरकार और ना कोई भी राष्ट्रीय राजनैतिक दल ऐसे आरक्षण का समर्थन करेंगे ॥ जहां बरसों से जाती आधारित जनगणना के सही सही आंकड़े सभी सरकारें ज़ाहिर करने से बच रही हैं , वहाँ अगड़ों को आरक्षण वें किस तरह से दे पाएगी ?!
.
ये 'पिछड़ों' के संवैधानिक आरक्षण का विरोध ज़्यादातर वें लोग ही कर रहे हैं जो जन्मगत 'अगड़े' हैं, और आर्थिक रूप से सक्षम हैं ! उन्होने 'जन्मगत अगड़े पर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों' को आगे कर के अपने सत्ता मे टूट रहे एकाधिकार को टीकाये रखने के लिए ये आंदोलन चलवाया हैं !! उनका आक्रोश ये हैं की , " 'एससी' , 'एसटी' और 'ओबीसी' के कुछेक लोग आर्थिक पैमानों पर आगे निकल चुकने के बावजूद भी आरक्षण का लाभ क्यूँ ले रहे हैं !!" तो जवाब ये हैं की, पिछड़ेवर्गों को आरक्षण 'गरीब होने पर' नहीं लेकिन, प्रशासन में उन के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए दिया गया है । कुछेक लोग आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भी, आज तक केन्द्रीय प्रशासन में प्रथम वर्ग की नौकरियो में 2011-12 में सिर्फ 6.9% ही है और 27% क्वोटा आजतक भरा गया नहीं है !! सामाजिक रूप से आज भी उन ज्ञाति-जातीयों की हालत पिछड़ी हुई हैं - आज भी उनका प्रतिनिधित्व ना तो सरकार मे ज्यादा हैं - ना ही सरकारी या निजी क्षेत्र की नौकरियों मे ठीक से हैं !!
.
पाटीदार के साथ साथ अब तो क्षत्रिय राजपूत , ब्राह्मण और वैश्य समाज भी मैदान मे उतर आए हैं !! मतलब की ये सब 'अगड़े - सवर्ण' लोग अब साथ मिलकर 'आरक्षण' को ही समाप्त करने की साज़िश रच रहे हैं - और देश के संविधान की मूलतः भावना को ही ठेस पोहंचना चाहते हैं !! शुक्र हैं , की इनके साथ ना कोई राजकीय दल हैं , और ना ही भारत के संविधान की रक्षा करने वाली सर्वोच्च अदालत हैं !!
.
जिनको भी आरक्षण चाहिए , वे पेहले आरक्षण को ठीक से समझे , सारी सही संवैधानिक प्रक्रियाओं को ठीक से अनुसरे - फिर नए सर्वे होने दे - फिर अगर मापदंडो पर खरे उतरे तब जाकर कुछ हो सकता हैं - हजारों की भीड़ से सड़क पर रैलीयों से अराजकता फैलाकर ना तो आरक्षण मिल सकता हैं , ना ही उसके एक भी मापदंड को बदला जा सकता हैं ! संविधान मे एक और बदलाव कर के 'आर्थिक मापदंड' पर भी थोड़ा आरक्षण मिले, उसके लिए किसी एक बड़े राजनैतिक दल को तो अपने साथ लाकर दिखाओ ! फिर शायद भविष्य मे कुछ हों ... !! वैसे कोई सरकार या सर्वोच्च अदालत 49% से ऊपर जाकर जो सवर्ण आर्थिक रूप से कमजोर हों - उनको 11% का और नया आरक्षण दे दें तो किसी को शायद शिकायत ना होगी ! जय हो !
.
- आनंद माड़म 6.45am . 18.08.2015
No comments:
Post a Comment